कहानी पलायन की : उत्तराखंड

पिछले एक दशक में, उत्तराखंड बड़े पैमाने पर पलायन को दर्शा रहा हैं और 950 से अधिक गाँव पूरी तरह से खत्म हो गए हैं। 3500 से अधिक गाँवों में 50 से कम की आबादी हैं। इस का मुख्य कारण विकास ना होना, पानी की कमी, जल संकट और जंगली जानवरों के कारण खेती ना होना और कृषि योग्य नौकरियों का अभाव हैं। बुजुर्ग लोगों की भारी आबादी वाले सिख जैसे गाँवों में, यह जानकर आश्चर्य होता है कि इस सब की देखभाल करने वाला यहाँ कोई नहीं है। सिकु में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, जो लगभग 7 ग्राम सभाओं को पूरा करता है, महीनों से बिना डॉक्टर के है। बेकार पड़ी PHC इमारत दिहाड़ी मजदूरों और वार्ड ब्वॉय के लिए एक रैन बसेरे के रूप में और बीमार सफाई कर्मचारियों को दवाई देने के काम में आती हैं।

आशा हैं की उत्तराखंड को राज्य का दर्जा मिलने के बाद पलायन रुक जाएगा और एक नए युग, एक नए वादे, एक नई शुरुआत की सुबह होगी। इसमें कोई शक नहीं है कि संचार, मोबाइल कनेक्टिविटी, सोशल मीडिया और 24×7 केबल टेलीविजन में बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। लेकिन पलायन रुक नहीं रहा है, युवक और युवतियां बड़ी संख्या में सपनों की तलाश में बाहर जा रहे  हैं- युवा लड़कियां अब हर दिन सैकड़ों गैलन पानी ले जाकर अपनी जवानी बर्बाद करना नहीं चाहती हैं! महिलाएं अमीर भूमि वाले किसानों के साथ विवाह के प्रस्तावों को अस्वीकार कर रही हैं और देहरादून या दिल्ली के मैदानी इलाकों में रहने वाले किसी भी मामूली पहाड़ी आदमी से शादी करना पसंद कर रही हैं या देश में कहीं भी जो पहाड़ियों की कठिनाइयों से दूर हो।

पहले युवा लोग खेतों से जंगली जानवरों को बाहर निकालते थे और अब इसका उलट हो गया है, जिससे ग्रामीणों को डर लगता है और कई गाँव के बुजुर्ग जंगली जानवरों के डर से पालतू जानवरों के साथ अलग गाँव में रहते हैं। कई मामलों में किसानों ने दिन के समय में बंदरों और लंगूरों के कहर के कारण खेती करना बंद कर दिया है और रात के समय में जंगली सूअर और तेंदुओं ने अपना अत्याचार जारी रखा है। इसलिए खेती, अकेले, खराब स्वास्थ्य और बदतर स्थिति से जूझ रहे बुजुर्ग किसानों के लिए अब मुमकिन नहीं है। राज्य की राजनीतिक और आर्थिक रूप से स्थिति से निपटने में असमर्थता का एक और प्रमाण यह भी हैं की भूमि समेकन (consolidation) कानून या चकबंदी केवल कागजों तक की सीमीत रही है। सरकार को यह जानने की जरूरत है कि राज्य की अपने पर्वतीय गांवों और ग्रामीणों के बिना कोई पहचान नहीं है। राज्य के दो जिलों में 2001 से 2011 तक लगातार जनसंख्या में नकारात्मक वृद्धि देखी गई है। यदि पलायन का यह सिलसिला जारी रहा, तो राज्य के लोग मैदानी इलाकों तक ही सीमित रहेंगे और पहाड़ केवल एक विशाल जंगल में बदल कर रह जायेगा जिसमे सिर्फ जंगली जानवर रहेंगे।

और जानकारी के लिए, पढ़िए The Wire वेबसाइट का आर्टिकल यहाँ.

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *