हरेला सोसायटी ने कोरोना के खिलाफ लड़ाई में विकसित किया पर्पल क्यूब

कोरोनावायरस महामारी अब तक 185 देशों में एक लाख से अधिक लोगों की जान और बीस लाख से अधिक लोगों को संक्रमित किया हैं। इससे व्यक्तिगत सुरक्षात्मक उपकरणों (पीपीई) जैसे मुखौटे, स्वास्थ्य किट, और चिकित्सा उपकरणों जैसे वेंटिलेटर की कमी हुई है।

इन चुनौतियों के बावजूद, पिथौरागढ़ की हरेला सोसायटी ने हिमालयी क्षेत्र में आशा की किरण जगाई है।

आवश्यकता आविष्कार की जननी है

कोरोनोवायरस के खिलाफ लड़ाई में मास्क, स्वास्थ्य किट और सैनिटाइज़र की कमी ने हरेला सोसायटी के युवाओं और स्वयंसेवकों को राहत कार्य — जिसमें जरूरतमंदों को भोजन वितरित करना शामिल है — करने के दौरान खुद को और दूसरों को संक्रमित होने से बचाने के लिए बैंगनी क्यूब (पर्पल क्यूब) को डिजाइन करने के लिए प्रेरित किया।

 

पर्पल क्यूब के पहले, हरेला सोसायटी के 125 युवाओं के स्वयमसेवक समूह ने हाइड्रोजन पेरोक्साइड, ब्लीच, सोडियम हाइपोक्लोराइट और इथेनॉल को सैनिटाइज़र के रूप में इस्तेमाल किया था, लेकिन लॉकडाउन ने इन सभी रसायनों की भारी कमी पैदा कर दी। फिर अन्य देशों के राहतकर्मियों द्वारा कोरोना वायरस को खत्म करने के लिए उपयोग किए जा रहे विकल्पों का अध्ययन करने पर स्वयंसेवकों को इंग्लैंड और चीन का पता चला जहाँ पराबैंगनी (यूवी) किरणों को हवादार जगह में उपयोग करके यहाँ तक की अस्पतालों को भी कीटाणुरहित किया जा रहा है। इस तकनीक से यूवी किरणों के माध्यम से किसी भी वायरस को उसके डीएनए/आरएनए को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाकर मार देता है। 

समस्या को हल करने के लिए सही जानकारी

हरेला सोसायटी के स्वयंसेवकों को तुरंत भोजन के पैकेट और अन्य राहत सामग्री को कीटाणुरहित करने में इस पर्पल क्यूब तकनीक की क्षमता का एहसास हो गया और इस उपकरण को बनाने के लिए कुछ पुराने रिवर्स ओस्मोसिस (आरओ) वाले वॉटर पयोरिफयर मशीनों के यूवी ट्यूबस के साथ प्रयोग शुरू किया। “बैंगनी क्यूब को बनाने में सोसायटी के देश भर में फैले हुए स्वयमसेवकों के समूह ने मदद किया जिनमे पॉलीमर विज्ञानिक  विनयदीप पूनेथा; माइक्रो बायोलॉजिस्ट अनिल कोठरी; आइआइटी दिल्ली के छात्र पवन गोस्वामी; हरेला सोसायटी की तकनीक टीम के भुवन पुनेरा; एवं अन्य लोग शामिल हैं,” हरेला सोसायटी के संस्थापक मनु ड़ाफाली बताते हैं। 

लेकिन यह प्रक्रिया सुनने में जितनी आसान लगती है उतनी आसान नहीं है। यूवी किरणों का उपयोग करते समय  सावधानी बरती जानी चाहिए क्योंकि ये मनुष्य के लिए हानिकारक होती हैं। इन किरणों को नंगी आंखों से देखे जाने पर अंधापन और त्वचा के सम्पर्क में आने पर कैंसर भी हो सकता है। इसी कारण वैज्ञानिकों ने केवल गैर-जीवित चीजों पर इस तकनीक के उपयोग का सुझाव दिया है।

“पर्पल क्यूब के माध्यम से हम बिना किसी चिंता राहत सामग्री, गाड़ियों, मास्क, ग्लव्ज़ एवं अन्य व्यक्तिगत सुरक्षात्मक उपकरणों को विषाणु से मुक्त कर रहे हैं। इससे हमारे काम में तेज़ी भी आयी है,” मनु बताते हैं।

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